रति ने गुनगुनाते हुए चाय का पानी चढ़ाया और अख़बार लेकर बालकनी में आकाश का इंतज़ार करने लगी. "चलो, देर आये, दुरुस्त आये. सालों से कहते कहते अब जाकर आकाश ने 'मार्निंग वाक' शुरू कर ही दी!
आकाश की उम्र के साथ साथ बढती तोंद उसके लिए चिंता का विषय थी.कई बार मार्निंग वाक की यह प्रथा आकाश शुरू करके तोड़ चुके थे, पर इस बार लगता है, इरादा पक्का है. शायद इनके इरादे से ज्यादा फॅमिली डॉक्टर की डांट का असर है, जो आकाश के बारबार ऊपर नीचे होते रक्तचाप और शुगर को लेकर हिदायते देते देते थक गए और आकाश चिकने घड़े बने रहे.
बस, फिर क्या था! इस बार जब आकाश अपनी बढ़ी हुई शुगर दिखने पंहुचे तो पिता सामान बुज़ुर्ग डॉक्टर ने सीधा आकाश के कान उमेठते हुए उनसे मार्निंग वाक नियमित रूप से करने का वादा ले लिया. उस समय आकाश के चेहरे पर बच्चों सी मासूमियत देखने लायक थी. और यूं भी तो आकाश का सहज-सरल स्वाभाव बच्चों सा ही तो है, सोचकर मुस्कुरा उठी रति. खैर, जनाब ने खुद पर ध्यान देना शुरू तो किया, रति ने चैन की साँस ली.
पंद्रह दिन बीत चुके हैं और आज वही रति थी और वही बालकनी , परन्तु मन में ख़ुशी की जगह चिंता थी.आकाश तो जैसे मार्निंग वाक में रम ही गए थे! जाते हैं तो वापस आने का नाम ही नहीं लेते हैं. शुरुआत तो पंद्रह मिनट से की थी, पर अब ये हाल था की डेढ़-डेढ़ घंटे तक आने का नाम नहीं! पूछो तो टाल जाते हैं, कहीं कोई चक्कर-वक्कर तो नहीं? यह सोचकर रति को ही चक्कर आने लगे.
पार्क में एक से एक खूबसूरत लड़कियां छोटे-छोटे कपडे पहनकर घूमती हैं. कहीं वही तो नहीं हैं आकाश की इस लम्बी-चौड़ी मार्निंग वाक का कारण? पर शायद गलती इसमें कहीं न कहीं मेरी ही है, एक टीस सी उसके मन में उठी!
आज अगर हमारे बच्चे होते तो शायद इधर-उधर भटकने की जगह आकाश अपने बच्चों के साथ खेल रहे होते!
तीन दिन इसी उधेड़-बुन में बीत गए. रति की आशंकाएं अब शक में बदलने लगीं. आज तो जैसे उसका सब्र जवाब दे चुका था! रात में भी बार-बार उसकी नींद उचटती रही. शादी के इतने वर्षों में आकाश का जो व्यवहार रहा, उसे याद करके किसी भी शक-ओ-शुबह की दूर दूर तक गुंजाईश नहीं थी. आकाश ने हमेशा उसे इतना प्यार दिया है की रति को तो जैसे याद ही नहीं रहा कि वह माँ नहीं बन सकती. लेकिन अब मन में उठती आशंकाओं से उसका विश्वास डामाडोल हो रहा है.
पहले दस-पंद्रह मिनट के लिए शुरू की हुई वाक दिन-ब-दिन बढती ही गयी. रति अपने पति पर शक नहीं करना चाहती, पर अचानक आकाश के स्वाभाव में जो बदलाव आ रहा है, उसे भी तो अनदेखा नहीं किया जा सकता! पहले तो उन्हें ठेलकर वाक में भेजना पड़ता था,मगर अब तो इन्हें जैसे रात भर रात के ढलने का इंतज़ार रहता है. और तो और वाक से वापस आने के बाद उनके चेहरे पर जो खुशी से भरी चमक होती है, वह जो बात-बात पर गुनगुनाने लगते हैं, क्या है ये सब?
तो क्या अब आकाश किसी और को....बस, इस से आगे वह सोच नहीं पाई. रात बहर वह करवटें बदलती रही.पता नहीं कब आँख लग गयी थी. जब आँख खुली तो झटपट उठकर देखा, आकाश वाक पर निकलने की तैयारी में थे. मन ही मन रति ने कुछ तय कर लिया. वह झट से वापस लेटकर आँखें मूंदे सोने का नाटक करती रही. रति आकाश के निकलते ही उसके पीछे हो ली.यह देखकर उसे बेहद आश्चर्य हुआ कि आकाश पार्क में न जा कर बाज़ार की ओर निकल गए.
'ओह, तो यहाँ मिलती है वह', सोचकर रति का खून खौल उठा.' आज देख लूंगी'. आकाश आगे जाकर एक दुकान पर रुका और कुछ सामान खरीदने लगा. 'तो चुड़ैल के लिए शौपिंग भी की जा रही है', रति का दिमाग पूरी तरह भन्ना चुका था.
आकाश आगे चल दिया. काले लिफाफे के अन्दर क्या सामान था, यह रति को दिख नहीं रहा था. करीब पंद्रह मिनट तक चलने के बाद आकाश कल्यानपुरी की झुग्गी-बस्ती पंहुच गए.यहाँ निचले तबके के लोग रहते थे. अब रति को समझ में नहीं आ रहा था की वह क्या सोचे और क्या समझे! झुग्गी-झोंपड़ियों के बीच आकाश का पीछा करते-करते वह बस्ती के बीचों-बीच पंहुच गयी.
'अंकल-अंकल' चिल्लाते हुए करीब दर्जन भर बच्चे आकाश की ओर लपके. आकाश मुस्कुराते हुए उन्हें काले लिफाफे से निकाल-निकाल कर टॉफी, ब्रेड व् बिस्कुट बाँट रहा था.
बच्चों को ख़ुशी-खुशी खाते हुए देख रति ने आकाश की आँखों में एक अजीब सी चमक देखी. उसे याद आया, कितनी ही बार आकाश ने उसे बच्चा गोद लेने की ज़िद की थी और हर बार उसने उनकी बात मानने से साफ़ इनकार कर दिया था. रति की आँखें शर्म से झुक गयीं. वह चुपचाप घर की तरफ चल दी.
तो क्या अब आकाश किसी और को....बस, इस से आगे वह सोच नहीं पाई. रात बहर वह करवटें बदलती रही.पता नहीं कब आँख लग गयी थी. जब आँख खुली तो झटपट उठकर देखा, आकाश वाक पर निकलने की तैयारी में थे. मन ही मन रति ने कुछ तय कर लिया. वह झट से वापस लेटकर आँखें मूंदे सोने का नाटक करती रही. रति आकाश के निकलते ही उसके पीछे हो ली.यह देखकर उसे बेहद आश्चर्य हुआ कि आकाश पार्क में न जा कर बाज़ार की ओर निकल गए.
'ओह, तो यहाँ मिलती है वह', सोचकर रति का खून खौल उठा.' आज देख लूंगी'. आकाश आगे जाकर एक दुकान पर रुका और कुछ सामान खरीदने लगा. 'तो चुड़ैल के लिए शौपिंग भी की जा रही है', रति का दिमाग पूरी तरह भन्ना चुका था.
आकाश आगे चल दिया. काले लिफाफे के अन्दर क्या सामान था, यह रति को दिख नहीं रहा था. करीब पंद्रह मिनट तक चलने के बाद आकाश कल्यानपुरी की झुग्गी-बस्ती पंहुच गए.यहाँ निचले तबके के लोग रहते थे. अब रति को समझ में नहीं आ रहा था की वह क्या सोचे और क्या समझे! झुग्गी-झोंपड़ियों के बीच आकाश का पीछा करते-करते वह बस्ती के बीचों-बीच पंहुच गयी.
'अंकल-अंकल' चिल्लाते हुए करीब दर्जन भर बच्चे आकाश की ओर लपके. आकाश मुस्कुराते हुए उन्हें काले लिफाफे से निकाल-निकाल कर टॉफी, ब्रेड व् बिस्कुट बाँट रहा था.
बच्चों को ख़ुशी-खुशी खाते हुए देख रति ने आकाश की आँखों में एक अजीब सी चमक देखी. उसे याद आया, कितनी ही बार आकाश ने उसे बच्चा गोद लेने की ज़िद की थी और हर बार उसने उनकी बात मानने से साफ़ इनकार कर दिया था. रति की आँखें शर्म से झुक गयीं. वह चुपचाप घर की तरफ चल दी.
इस घटना को दस दिन बीत चुके हैं. रति गुनगुनाते हुए किचन में दूध गरम कर रही है. अन्दर आकाश अपनी प्यारी सी बेटी से खेल रहे हैं. 'लीजिये, दूध पिला दीजिये अपनी लाडली को', कहते हुए रति ने आकाश को दूध की बोतल पकड़ा दी, जो गोद में खेल रही बच्ची के साथ बच्चे बने हुए थे.
सचमुच, इस गुड़िया की ही तो कमी थी उनकी ज़िन्दगी में, और इस नन्ही गुड़िया को इंतज़ार था अपने माता-पिता का. एक बच्चे को गोद लेने से अब उनका परिवार पूरा हो गया है.
'बस, एक परेशानी रह गयी', रति सोचकर मुस्कुरा उठी. अब उसे फिर से आकाश को 'मार्निंग वाक' के लिए रोज़ खदेड़ना पड़ता है!


bahut badiya...TABIYAT KHUSH KAR DII......"aisi devrani cum friend ;)..pe garv hai..":)<3
ReplyDeleteThanks my sweet bhabi! 💖
ReplyDeleteLovely..
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