यही सोचते-सोचते भैरवी स्कूल पहुँच गयी. हर बार की तरह वह आश्चर्यचकित निगाहों से बच्चों की माओं को देखने लगी. एक से एक साड़ी , सलवार-कमीज़ और जींस -टॉप में सब ऐसे खड़ी थीं मानो किसी ब्यूटी कांटेस्ट में हिस्सा लेने आई हों. "इतना समय कैसे मिल जाता है इन्हें? इन सब की भी तो गृहस्थी है, बच्चे हैं?", सोचने लगी वह. तभी तनु की मम्मी उसके पास आयीं और बातें करने लगी. उनका सुन्दर सा सूट , सैंडल, मैचिंग पर्स और लहलहाते खुले बाल देखकर भैरवी को अपने पुराने से सूट व बाथरूम स्लीपर का एहसास हुआ.
"कल से अच्छे कपड़े पहनूंगी ", उसने मन ही मन निश्चय किया. "अगर टाइम मिले तो", दुसरे पल यह ख्याल आते ही उसने एक लम्बी सी आह भरी!
शाम को चार बजे भैरवी अपने लिए चाय का पानी चढ़ा ही रही थी कि दरवाज़े की घंटी सुनकर चोंक उठी. "इस समय कौन आया होगा?", दरवाज़ा खोलकर देखा तो सामने मोहिनी खड़ी थी. उसकी बचपन की सहेली. आज इतने सालों के बाद मिलकर दोनों सहेलियां एक दुसरे के गले से लिपट गयीं. "मोहिनी, तू यहाँ कैसे? दिल्ली कब आई?पहले खबर क्यों नहीं की?", सवालों की झड़ी लगा दी भैरवी ने. "सब बताती हूँ, पहले पानी तो पिला, बाहर कितनी गर्मी है!
फ्रिज से ठंडी बोतल निकलते हुए भैरवी का मन अतीत में भटकने लगा. मोहिनी उनके स्कूल की सबसे होनहार छात्रा थी. इन्जीनीरिंग की पढाई पूरी करके वह विदेश जाकर वहीँ बस गयी थी. कभी-कभी वहीँ से फ़ोन करके वह उसके हाल-चाल ले लेती थी.
पानी लेकर भैरवी बैठक में आई तो देखा कि मोहिनी उसके बच्चों को रंगीन चमचमाते कागज़ में लिपटे कई उपहार दे रही है. "अरे, इस सब की क्या ज़रुरत थी", वह बोल पड़ी. " तेरे लिए भी एक है, खोल कर तो देख", कहते हुए मोहिनी ने उसे भी एक पाकेट पकड़ा दिया. कट वर्क में क्रिस्टल का एक बड़ा सा खूबसूरत फूलदान देखकर भैरवी की ऑंखें फटी की फटी रह गयीं.
भैरवी के बगल में दोनों बच्चे चैन की नींद सो रहे थे. कोने में सोये अभि के हलके हलके खुर्राटों की आवाज़ आ रही थी, पर भैरवी की आंखों में नींद का नामोनिशान न था. आमतौर पर तो थके होने के कारण उसे तकिये पर सर रखते ही नींद आ जाती थी, पर आज मोहिनी के विचार उसके दिलोदिमाग पर हावी थे. मोहिनी ने आकर जैसे भैरवी के शांत जीवन पर कंकड़ फैंक दिया था. रह रह कर उसके मन में अशांति की लहरें उठ रही थी. मोहिनी का ऐश्वर्य देख कर वह अचंभित थी. "कितनी बढ़िया ज़िन्दगी है मोहिनी की", उसके दिल में टीस सी उठी. " सब कुछ तो है उसके पास, बढ़िया नौकरी, बेइंतेहा दौलत, अपने लिए भी कितना समय निकल लेती है वह. हर हफ्ते फशिअल, तभी तो इतनी निखरी त्वचा है. लेटेस्ट फैशन के कपड़े पहने थे, क्या ऐश है. एकाएक उठकर भैरवी आइने के सामने जाकर खड़ी हो गयीं. अपना थका हुआ चेहरा और आँखों के नीचे काले घेरे देखकर एक बार फिर मोहिनी का दमकता हुआ चेहरा उसकी आँखों के सामने घूमने लगा . वह मन ही मन अपने जीवन को कोसने लगी. उसे अभि पर भी गुस्सा आने लगा जो अपने काम में इतने उलझे रहते थे कि उसका हाथ बटाना तो दूर, कभी उसके काम की सराहना भी नहीं करते थे. उसे याद नहीं था कब आखिरी बार वे पिक्चर देखने या घूमने के लिए घर से बाहर निकले थे. "बाकि पति अपनी पत्नियों को कितने प्यार से रखते हैं,उन्हें कितने उपहार देते हैं, यहाँ तो ये कई बार मेरा जन्मदिन भी भूल जाते हैं. मुझे तो लगता है कि मेरा ओहदा इस घर में सिर्फ एक नौकरानी का है, जो सबकी इच्छा पूरी करती रहती है. न इन्हें और न ही बच्चों को मुझसे प्यार है, सबका अपना-अपना स्वार्थ है", सोचते-सोचते कब रात बीत गई और कब सुबह हो गई पता ही नहीं चला भैरवी को.
कुछ दिनभर की थकान और कुछ रातभर जागने का असर था कि खड़े होते ही भैरवी का सर घूमने लगा. उसे ज़ोर से चक्कर आया और वह गश खाकर गिर पड़ी.
आँख खुलने पर भैरवी ने देखा कि वह बिस्तर पर लेटी है. मिनी उसके पैर दबा रही थी और राहुल उसके सर पर अपने छोटे-छोटे हाथ फेर रहा था. "पापा, जल्दी आओ, मम्मी को होश आ गया", ख़ुशी से चिल्ला पड़े बच्चे. अभि दौड़ते हुए रसोई से बहर निकले. उनके हाथ आटे से सने हुए थे. "रोटी बना रहा था:, खिसियाये हुए चेहरे से से अभि ने समझाया. "पर आपका ऑफिस?"
"ऑफिस तो रोज़ का है, बीबी रोज़ थोड़ी बीमार होती है", मुस्कुराते हुए अभि ने उसके सर पर हाथ फेरा, "अब कैसी तबियत है? डॉक्टर कह रहे थे की बस आराम की ज़रुरत है तुम्हें, इसलिए मैंने ऑफिस से एक हफ्ते की छुट्टी ले ली है." मिनी चहकते हुए बोली,"मम्मी, आज मैंने सब्जी काटी और पापा ने खाना बनाया"
"अपने खाना बनाया?", विश्वास नहीं हो रहा था भैरवी को.
"मैं बाकी दिनों भले ही घर के काम को हाथ न लगाऊं, पर ज़रुरत पड़ने पर सब कुछ कर सकता हूँ. अब एक हफ्ते तक तुम करोगी आराम और मैं करूँगा काम!"
अभि के हाथों की बनाई कच्ची-पक्की रोटियां, पानी जसी दाल और जली हुई सब्जी भैरवी को भगवान के प्रसाद के जैसी लग रही थी. "खाना ठीक तो है?", भैरवी की आँखों में आंसू देखकर अभी ने चिंता प्रकट की. "इतना स्वादिष्ट खाना मैंने आजतक नहीं खाया, इसमें आपका प्यार जो मिला हुआ है", भैरवी ने आंसू पोछते हुए जवाब दिया.
"चलो, चलो, अब मम्मी को आराम करने दो, मैं तुम्हे होमेवोर्क करता हूँ:, कहते हुए अभी बच्चों को दूसरे कमरे में ले गए.
भैरवी की बंद पलकों से पश्चाताप के आंसू झर-झर बह रहे थे.कितनी बड़ी गलती की थी उसने अपने पति और बच्चों को समझने में! यही तो जीवन की ख़ुशी है, यही प्यार तो उसके जीवन का आधार है. अपनों के लिए दिनभर काम करने में ही तो असली सुख है, वह कैसे भूल गई? आज भैरवी को घर में अपना असली ओहदा समझ में आ गया था,नौकरानी का नहीं, घर की रानी का !
"कल से अच्छे कपड़े पहनूंगी ", उसने मन ही मन निश्चय किया. "अगर टाइम मिले तो", दुसरे पल यह ख्याल आते ही उसने एक लम्बी सी आह भरी!
शाम को चार बजे भैरवी अपने लिए चाय का पानी चढ़ा ही रही थी कि दरवाज़े की घंटी सुनकर चोंक उठी. "इस समय कौन आया होगा?", दरवाज़ा खोलकर देखा तो सामने मोहिनी खड़ी थी. उसकी बचपन की सहेली. आज इतने सालों के बाद मिलकर दोनों सहेलियां एक दुसरे के गले से लिपट गयीं. "मोहिनी, तू यहाँ कैसे? दिल्ली कब आई?पहले खबर क्यों नहीं की?", सवालों की झड़ी लगा दी भैरवी ने. "सब बताती हूँ, पहले पानी तो पिला, बाहर कितनी गर्मी है!
फ्रिज से ठंडी बोतल निकलते हुए भैरवी का मन अतीत में भटकने लगा. मोहिनी उनके स्कूल की सबसे होनहार छात्रा थी. इन्जीनीरिंग की पढाई पूरी करके वह विदेश जाकर वहीँ बस गयी थी. कभी-कभी वहीँ से फ़ोन करके वह उसके हाल-चाल ले लेती थी.
पानी लेकर भैरवी बैठक में आई तो देखा कि मोहिनी उसके बच्चों को रंगीन चमचमाते कागज़ में लिपटे कई उपहार दे रही है. "अरे, इस सब की क्या ज़रुरत थी", वह बोल पड़ी. " तेरे लिए भी एक है, खोल कर तो देख", कहते हुए मोहिनी ने उसे भी एक पाकेट पकड़ा दिया. कट वर्क में क्रिस्टल का एक बड़ा सा खूबसूरत फूलदान देखकर भैरवी की ऑंखें फटी की फटी रह गयीं.
भैरवी के बगल में दोनों बच्चे चैन की नींद सो रहे थे. कोने में सोये अभि के हलके हलके खुर्राटों की आवाज़ आ रही थी, पर भैरवी की आंखों में नींद का नामोनिशान न था. आमतौर पर तो थके होने के कारण उसे तकिये पर सर रखते ही नींद आ जाती थी, पर आज मोहिनी के विचार उसके दिलोदिमाग पर हावी थे. मोहिनी ने आकर जैसे भैरवी के शांत जीवन पर कंकड़ फैंक दिया था. रह रह कर उसके मन में अशांति की लहरें उठ रही थी. मोहिनी का ऐश्वर्य देख कर वह अचंभित थी. "कितनी बढ़िया ज़िन्दगी है मोहिनी की", उसके दिल में टीस सी उठी. " सब कुछ तो है उसके पास, बढ़िया नौकरी, बेइंतेहा दौलत, अपने लिए भी कितना समय निकल लेती है वह. हर हफ्ते फशिअल, तभी तो इतनी निखरी त्वचा है. लेटेस्ट फैशन के कपड़े पहने थे, क्या ऐश है. एकाएक उठकर भैरवी आइने के सामने जाकर खड़ी हो गयीं. अपना थका हुआ चेहरा और आँखों के नीचे काले घेरे देखकर एक बार फिर मोहिनी का दमकता हुआ चेहरा उसकी आँखों के सामने घूमने लगा . वह मन ही मन अपने जीवन को कोसने लगी. उसे अभि पर भी गुस्सा आने लगा जो अपने काम में इतने उलझे रहते थे कि उसका हाथ बटाना तो दूर, कभी उसके काम की सराहना भी नहीं करते थे. उसे याद नहीं था कब आखिरी बार वे पिक्चर देखने या घूमने के लिए घर से बाहर निकले थे. "बाकि पति अपनी पत्नियों को कितने प्यार से रखते हैं,उन्हें कितने उपहार देते हैं, यहाँ तो ये कई बार मेरा जन्मदिन भी भूल जाते हैं. मुझे तो लगता है कि मेरा ओहदा इस घर में सिर्फ एक नौकरानी का है, जो सबकी इच्छा पूरी करती रहती है. न इन्हें और न ही बच्चों को मुझसे प्यार है, सबका अपना-अपना स्वार्थ है", सोचते-सोचते कब रात बीत गई और कब सुबह हो गई पता ही नहीं चला भैरवी को.
कुछ दिनभर की थकान और कुछ रातभर जागने का असर था कि खड़े होते ही भैरवी का सर घूमने लगा. उसे ज़ोर से चक्कर आया और वह गश खाकर गिर पड़ी.
आँख खुलने पर भैरवी ने देखा कि वह बिस्तर पर लेटी है. मिनी उसके पैर दबा रही थी और राहुल उसके सर पर अपने छोटे-छोटे हाथ फेर रहा था. "पापा, जल्दी आओ, मम्मी को होश आ गया", ख़ुशी से चिल्ला पड़े बच्चे. अभि दौड़ते हुए रसोई से बहर निकले. उनके हाथ आटे से सने हुए थे. "रोटी बना रहा था:, खिसियाये हुए चेहरे से से अभि ने समझाया. "पर आपका ऑफिस?"
"ऑफिस तो रोज़ का है, बीबी रोज़ थोड़ी बीमार होती है", मुस्कुराते हुए अभि ने उसके सर पर हाथ फेरा, "अब कैसी तबियत है? डॉक्टर कह रहे थे की बस आराम की ज़रुरत है तुम्हें, इसलिए मैंने ऑफिस से एक हफ्ते की छुट्टी ले ली है." मिनी चहकते हुए बोली,"मम्मी, आज मैंने सब्जी काटी और पापा ने खाना बनाया"
"अपने खाना बनाया?", विश्वास नहीं हो रहा था भैरवी को.
"मैं बाकी दिनों भले ही घर के काम को हाथ न लगाऊं, पर ज़रुरत पड़ने पर सब कुछ कर सकता हूँ. अब एक हफ्ते तक तुम करोगी आराम और मैं करूँगा काम!"
अभि के हाथों की बनाई कच्ची-पक्की रोटियां, पानी जसी दाल और जली हुई सब्जी भैरवी को भगवान के प्रसाद के जैसी लग रही थी. "खाना ठीक तो है?", भैरवी की आँखों में आंसू देखकर अभी ने चिंता प्रकट की. "इतना स्वादिष्ट खाना मैंने आजतक नहीं खाया, इसमें आपका प्यार जो मिला हुआ है", भैरवी ने आंसू पोछते हुए जवाब दिया.
"चलो, चलो, अब मम्मी को आराम करने दो, मैं तुम्हे होमेवोर्क करता हूँ:, कहते हुए अभी बच्चों को दूसरे कमरे में ले गए.
भैरवी की बंद पलकों से पश्चाताप के आंसू झर-झर बह रहे थे.कितनी बड़ी गलती की थी उसने अपने पति और बच्चों को समझने में! यही तो जीवन की ख़ुशी है, यही प्यार तो उसके जीवन का आधार है. अपनों के लिए दिनभर काम करने में ही तो असली सुख है, वह कैसे भूल गई? आज भैरवी को घर में अपना असली ओहदा समझ में आ गया था,नौकरानी का नहीं, घर की रानी का !

Again will say very well written.Setting of the story is so realistic that it makes it a factual story.The story really touches your heart.Above all your creativity has removed the language bar too.Amazingly written in Hindi.Congratulations again for your creative endeavor & All The Best!
ReplyDeleteSmita
I feel humbled by your comments. Thank you!
Deletevery touching n real..........dil mage more
ReplyDeleteThanks a million! 😊
DeleteVery real emotions..!!
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